एचएनएलयू में ‘ट्राइब्स ऑफ छत्तीसगढ़: लॉ एंड लाइव्स’ पुस्तक का विमोचन
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रायपुर। हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एचएनएलयू) के सेंटर फॉर लॉ एंड इंडिजिनस स्टडीज़ (सीएलआईएस) ने जनजातीय कस्टमरी लॉज़ पर एक महत्वपूर्ण अकादमिक योगदान दर्ज किया है। विश्वविद्यालय में आयोजित समारोह में “ट्राइब्स ऑफ छत्तीसगढ़: लॉ एंड लाइव्स” नामक पुस्तक का विमोचन किया गया। यह पुस्तक छत्तीसगढ़ की जनजातीय समुदायों के रीति-रिवाजों, परंपराओं और सामाजिक-वैधानिक प्रक्रियाओं का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करती है।
विमोचन समारोह में न्यायमूर्ति अरूप कुमार गोस्वामी, चेयरपर्सन, असम मानवाधिकार आयोग एवं एचएनएलयू के डिस्टिंग्विश्ड ज्यूरिस्ट प्रोफेसर, मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर एचएनएलयू के कुलपति प्रो. (डॉ.) वी.सी. विवेकानंदन, रजिस्ट्रार, फैकल्टी सदस्य और विद्यार्थी भी शामिल हुए।
कुलपति प्रो. (डॉ.) विवेकानंदन ने अपने उद्बोधन में कहा कि यह पुस्तक विश्वविद्यालय की उस दृष्टि का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य जनजातीय कस्टमरी लॉज़ को दस्तावेज़ित करना और संरक्षित रखना है। उन्होंने कहा, “ये कानून केवल शैक्षिक विमर्श के लिए ही नहीं, बल्कि आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान और कानूनी धरोहर की रक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।”
न्यायमूर्ति गोस्वामी ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह अध्ययन “लीगल प्लुरलिज़्म और इंडिजिनस राइट्स पर राष्ट्रीय संवाद में एक सार्थक योगदान है, जो संवैधानिक संरक्षण और जनजातीय पहचान के सम्मान के बीच संतुलन की आवश्यकता को रेखांकित करता है।”
इस पुस्तक के लेखक एचएनएलयू के फैकल्टी डॉ. अयन हज़रा हैं, जबकि 9वें सेमेस्टर के छात्र अनस खान ने सह-लेखक के रूप में योगदान दिया। पुस्तक की विशेषता यह रही कि इसमें विश्वविद्यालय के शेड्यूल्ड ट्राइब विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही। विभिन्न जनजातियों से आने वाले इन विद्यार्थियों ने फील्डवर्क, डेटा कलेक्शन और अपने अनुभवों से पुस्तक की सामग्री को समृद्ध किया।
“ट्राइब्स ऑफ छत्तीसगढ़: लॉ एंड लाइव्स” में विवाह, उत्तराधिकार, संपत्ति, भूमि उपयोग और विवाद समाधान जैसे विषयों पर गहन शोध प्रस्तुत किया गया है। साथ ही यह पुस्तक संविधान के सिद्धांतों और पारंपरिक आदिवासी प्रणालियों के बीच बदलते संबंधों का विश्लेषण भी करती है, विशेषकर जेंडर राइट्स, भूमि हस्तांतरण और न्याय वितरण के संदर्भ में।
यह पुस्तक अकादमिक जगत, नीति-निर्माताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए एक मूल्यवान संसाधन साबित होगी, जो आदिवासी अधिकारों और लीगल प्लुरलिज़्म के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं।
