भगवान के तीन रूप हैं सत्य, चैतन्य व आनंद – श्री इन्द्रेश महाराज
1 min read
Share this
0- श्रीमद्भागवत कथा में इसी का है वर्णन, इसका महात्म्य जानना जरूरी
0- कथा के प्रथम दिन विशाल मंगल कलश यात्रा निकाली गई
रायपुर। श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दिवस श्री इन्द्रेश जी महाराज ने व्यासपीठ पर विराजते ही हजारों की तादाद में कथा स्थल कृषि उपज मंडी देवेन्द्रनगर मैदान में मौजूद श्रद्धालुओं का उत्साह बढ़ाते हुए कहा कि रायपुर आकर उन्हे महसूस हुआ कि छत्तीसगढिय़ा-सबले बढिय़ा। कथा श्रवण करने में इसी उत्साह की प्रधानता है। भगवान का नाम लेते हैं तो और ज्यादा उत्साह आ जाता है, यह नित दिन बढ़ेगा और देखना कथा विश्राम दिवस तक ऐसा लगेगा कथा खत्म न हो और चलती रहे,ये उत्साह कायम रहे। संक्षिप्त व्याख्या में उन्होने श्रीमद्भागवत कथा का महात्म्य क्या है बताया। कथा पूर्व सुबह विशाल मंगल कलश यात्रा निकाली गई जिसमें पांच हजार से अधिक महिलाएं शामिल थीं।

श्रीमद्भागवत कथा के महात्म्य की चर्चा करते हुए श्री इन्द्रेश जी महाराज ने कहा कि भगवान के तीन रुप है सत्य,चैतन्य व आनंद, इसी का वर्णन किया है। जो कर रहे हैं या करेंगे उसी में हमारा भला है, स्वीकार कीजिए मेंरे साथ जो हो रहा है वही सत्य है। जीवन में प्रयास तो बहुत किया पर नियति ने कुछ और कर दिया। प्राप्त-अप्राप्त में न जाइए। उनके प्रति समर्पण रखिए। लेकिन होता है क्या हम ठाकुर जी को जाकर बताते हैं कि ये करो-वो करो। इसलिए कि संसार की माया आकृष्ट कर लेती है। इसलिए सूरदास जी कहते हैं जैसे रखो-वैसे रहो। मांगिए मत उन्हें दीजिए, प्रभु मुझे अपने शरण पर ले लीजिए। दूसरा रूप है चैतन्य, ना तो वे अष्टधातु के हैं, न सोना-चांदी या किसी अन्य धातु के। प्रभु मूर्ति नहीं वो चैतन्य हैं। वे सब क्रिया करते हैं, जड़ नहीं हैं। जो जड़ बुद्धि रखता है ठाकुर जी उसको जड़ समझते हैं। चैतन्य बुद्धि नहीं है तभी तो गणपति जी का विसर्जन नहीं करते हैं उसे फेंक देते हैं। यही तो है जड़ बुद्धि। यदि सत्य व चैतन्य को जान गए तो तीसरा रुप आनंद वैसे ही आ जायेगा। लेकिन इतना भी जान लें कि सुख और आनंद में अंतर है। सुख सांसारिक वस्तु से मिलता है जो एक लिमिट के बाद दुख देने लगता है। आनंद मिलेगा कथा में आने से प्रभु के दर्शन करने से। ठाकुर जी के प्रति प्रेम, भाव, सम्मान, भक्ति रखो। वही खिला रहे हैं,वहीं पिला रहे हैं वही चला रहे हैं यही भगवान का आनंद रुप है। इसलिए मेरे साथ गाओ..कहते हो तुम कन्हैया मेरा नाम हो रहा है, प्रभु तुम्हारे नाम से मेरा सब काम हो रहा है।

महाराज श्री ने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य व त्याग का प्रार्दुभाव बताते हुए कहा कि ऐसी बात नहीं है कि जो कथा श्रवण करता है या भजन करता है उसके जीवन में कष्ट नहीं आयेगा,लेकिन भक्ति मार्ग पर चलने से यह दूर हो जायेगा। ज्ञान के संदर्भ में कहा कि विवेकयुुक्त ज्ञान चाहिए। किसी के प्रति राग या आशक्ति न होना ही वैराग्य है। हर परिस्थिति को सहने की आदत हो जाए और त्याग सबसे महत्वपूर्ण है जो ठाकुर जी के प्रति, कथा व भजन के प्रति, सनातन, सात्विकता से दूर रहते हैं उनसे आप दूरी बना लो, ऐसे लोगों का त्याग करो।
जगन्नाथ जी प्रभु ने कथा को टेकओवर कर लिया है..
श्री इन्द्रेश जी महाराज के व्यासपीठ के साथ भगवान जगन्नाथ प्रभु साक्षात स्वरुप में विराजे हैं। बहुत ही महत्वपूर्ण बात उन्होंने कही कि महाप्रभु जगन्नाथ, सुभद्रा व बलभद्र के साथ आप सुदर्शन जी का भी दर्शन करें। यह अति आवश्यक है जो दंड के आकार में हैं। सतयुग, त्रेता व द्वापर में अपराध करने पर किसी – किसी का वध करना पड़ता था लेकिन कलयुग में अपराध करने वाले सबसे ज्यादा हैं तो क्या सबका वध करेंगे नहीं, महाप्रभु कहते हैं मैं सबको स्वीकार करुंगा। जो गलती हो गई उसकी चिंता मत करो केवल यह करो कि अब आगे नहीं होगा तब मैं तुम्हे स्वीकारूंगा। इसलिए दंडरुप में रहना है चक्र नहीं। उन्होंने बताया कि यहां रोज प्रभु का नया श्रंृगार के साथ दर्शन करेंगे। उन्होने सेवादार गुंजन प्रजापति से आग्रह किया कि श्रीकृष्ण जन्मोत्सव तक प्रभु जी की महाप्रसादी भी आ जाए और चालीस हजार श्रद्दालुओं को वितरण हो जाए तो अति आनंद आ जायेगा।
भव्य मंगल कलश यात्रा में 5 हजार से अधिक महिलाएं हुई शामिल
श्रीमद्भागवत कथा प्रारंभ होने से पूर्व सोमवार सुबह भव्य मंगल कलश यात्रा श्रीराम जानकी मंदिर कृषि उपज मंडी के सामने देवेन्द्रनगर से प्रारंभ होकर कथा स्थल पहुंची। आयोजन समिति की व्यवस्था के अनुसार 2100 महिलाओं की कलश यात्रा निकाली जानी थी लेकिन श्रद्दालुओं का उत्साह इतना था कि 5 हजार से भी अधिक महिलाएं पहुंच गई और सभी भक्तिभाव से कलश यात्रा में शामिल हुए। कलशधारी सभी महिलाएं पीली रंग की साड़ी पहनी हुई थी। श्रीमद्भागवत पुराण सिर पर धारण कर जजमान परिवार आगे-आगे चल रहे थे। पूरे मार्ग पर भक्ति उद्घोष के साथ जयकारे लगते रहे। बाजे गाजे व पुष्पवर्षा के बीच पूरा माहौल भक्तिमय बना हुआ था।
