9 शिक्षादूतों की हत्या के बाद शिक्षादूतों द्वारा संचालित स्कूलों को लेकर शिक्षा विभाग चिंतित
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बीजापुर। शासन-प्रशासन नक्सल प्रभावित इलाकों में बंद पड़े स्कूलों को खोलकर वहां स्थानिय आदिवासी शिक्षित युवाओं को शिक्षादूत के रूप में तैनात कर स्कूलों का संचालन कर रही है। वहीं दूसरी ओर नक्सलियों द्वारा बीते पांच वर्षों के भीतर सिलसिलेवार 9 शिक्षादूतों की हत्या से नक्सल प्रभावित इलाकों में कार्यरत शिक्षादूतों में भय का माहौल बना हुआ है।
विगत एक हफते के भीतर सुकमा से बीजापुर तक दो शिक्षादूतों की हत्या ने इन्हें ना सिर्फ भीतर तक झकझोर कर रख दिया है, बल्कि अब ये अपने भविष्य को लेकर चिंतित है। साथी शिक्षादूत कल्लू ताती को अंतिम बिदाई देने तोड़का पहुंचे शिक्षादूतों ने नक्सलियों के इस कृत्य से स्वयं भयभीत होना बताते हुए उनका कहना है कि जो परिस्थितियां निर्मित हुई इसके मद्देनजर सरकार शिक्षादूतों का भविष्य सुनिश्चत करे, उनकी प्रमुख मांग सहायक शिक्षक भर्ती में प्राथमिकता को लेकर है। नक्सली हत्या की बढ़ती वारदातों से शिक्षादूत जहां भयाक्रांत है, वही अंदरूनी इलाकों में इनके बूते संचालित स्कूलों के भविष्य को लेकर अब शिक्षा विभाग भी चिंतित है।
शिक्षादूतों की मानें तो जिन इलाकों में अब भी नक्सलियों का वर्चस्व है, वहां जोखिम उठाकर वे बच्चों को पढ़ा रहे हैं। बेहतर कल गढऩे में उनकी मदद कर रहे हैं। इसके एवज में उन्हें महज दस हजार रूपए मासिक वेतन मिलता है, जो नाकाफी है । इतने अल्प वेतन से ना तो वे परिवार पाल सकते हैं, औरना ही परिवार की भविष्य निधि के लिए रूपए जोड़ सकते हैं। वहीं नक्सलियों द्वारा शिक्षादूतों की हत्याएं की जा रही हैं, इस जोखिम के बाद भी शिक्षादूतों के परिजनों के लिए अनुकंपा का कोई प्रावधान नहीं है।
शिक्षादूतों की केवल दो प्रमुख मांगें है, पहली सहायक शिक्षा भर्ती में अन्य जिलों के अभ्यार्थियों को ना लेते हुए उन्हें प्राथमिकता दी जाए। दूसरी अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान तय हो । हम नदी नाले पार कर नियमित ड्यूटी करते हैं, बावजूद सरकार हमारी मांगे नहीं सुन नहीं तो दूसरी तरफ नक्सली टारगेट कर रहे हैं, हम दोहरी मार झेल रहे हैं। मौजूदा परिस्थिति इधर कुआं उधर खाई जैसी बनी हुई हैं। इन हालातों में महज दस हजार के लिए अपनी जिंदगी दांव पर कैसे लगा सकते हैं।
